Dadaji Maharaj
Sitarist Prabal Chowdhury
Dadaji Maharaj
Sitarist Prabal Chowdhury

 

About BakreswarAbout Dibbyashram and Dadaji MaharajMiracles
The miraculous incidents of Bakreswar and Tarapith

 

ABOUT BAKRESWAR

AND

TARAPITH

 

The dibbyashram is developed on the great siddhapith at Bakreswar. This great siddhapith is located in the small village of Bakreswar in the district of Birbhum in West Bengal. This village though small is renowned for its unlimited spiritual energy and divine effect of the land. From the time of Satya-yug mention of this place has been found in the shastras, covering about 20,000 years. No spiritual place with such ancient lineage has been found in India. This place has been named after Mahamuni Ashtabakra Rishi and has been famous as Bakreswar or Bakreswar Dham. Ashtabakra Muni engaged himself in deep meditation here beside the bramha-kunda of this place in order to be cured from the incurable disease and after receiving the blessings of Lord Shiva was totally cured. In later days Mahadev, Narayan, Narada, Dattatreya Rishi, Sapta Rishi, Sandipan Muni (Guru of Lord Krishna), Durbasha Rishi, Nityananda Mahaprabhu, Sadhak Bamdev, Ramnath Aghori and many other sadhak yogis attained great spiritual accomplishment by meditating in this auspicious land. Still now a number of yogis are engaged in meditation in this place. The dibbyashram is located in this auspicious land. The ashram was founded by Dadaji Maharaj. It is located in such a place, covered with thick forest, where previously a number of yogis engaged themselves in sadhana. In the midst of number of miraculous incidents Dadaji Maharaj founded this ashram with the direct blessings of Lord Shiva. Still today various supernatural incidents are taking place one after another since the foundation of the ashram. Many people have become the witness of these various supernatural incidents. A few pictures of these incidents have been brought to light in this site through the medium of internet. In the dibbyashram founded amidst the beautiful natural settings of Bakreswar the sadhan pith of Dadaji Maharaj is present where the disciples of Dadaji engage themselves in sadhana. The disciples of Dadaji meditate in the ashram following the instructions of Dadaji Maharaj and practicing the secrets of sadhana as shown by Dadaji Maharaj. A few among these disciples had also received the blessings of divine persons in the process of sadhana. Set in calm and peaceful village environment on the confluence of siddha Bakreswar river flowing on the north and the divine ‘Swet Ganga’ and the mahasiddha Bakreswar Mahasamshan (crematorial ground) on one side the dibbyashram, surrounded by beautiful trees and flowering plants welcomes the sadhaks with open arms inspiring them to meditate and reach salvation and attain God. This is indeed a very captivating place for meditation.

Dadaji Maharaj

 

‘দিব্যাশ্রম’ আশ্রমটি একটি মহা সিদ্ধপিঠের উপর প্রতিষ্ঠিত। এই মহা সিদ্ধাপিঠটি হলো পশ্চিম বঙ্গের বীরভূম জেলার অন্তর্গত ছোট একটি গ্রাম ‘বক্রেশ্বর’ নামে পরিচিত। এই গ্রামটি ছোট হলেও এর স্থান মাহাত্ম বা আধ্যাত্মিক মাহাত্ম অপরিসীম। প্রায় সত্য যুগের সময় থেকে বিভিন্ন শাস্ত্র গ্রন্থে এই স্থানটির পরিচয় পাওয়া যায়, যার বয়স প্রায় ২০,০০০ বছর। এত প্রাচীন তীর্থ স্থান ভারতের আর কোথাও আছে বলে জানা নেই। মহামুনি অষ্টাবক্র ঋষির নাম অনুসারে এই জায়গার নাম হয় বক্রেশ্বর পীঠ বা বক্রেশ্বর ধাম। এই মহাঋষি নিজের শরীরের রোগ-কে সারাবার জন্য এই স্থানের ‘ব্রহ্মকুণ্ডে’ তপস্যা করে মহাদেবের আশীর্বাদে রোগ মুক্ত হয়েছিলেন। পরবর্তী কালে মহাদেব, নারায়ণ, নারদ, দত্তাত্রেয় ঋষি, সপ্তর্ষি, সন্দিপন মুনি (কৃষ্ণের গুরু), দুর্বাসা ঋষি, মেধস ঋষি, নিত্যানান্দা মহাপ্রভু, সাধক বামাখ্যাপা, রামনাথ অঘোরী সহ বহু সাধক এখানে সাধন করে মহাসিদ্ধি লাভ করেছেন। এখনও বহু সাধক এখানে সাধনরত অবস্থায় আছেন। এই ‘দিব্যাশ্রম’-টি এই মহাপীঠে অবস্থিত। আশ্রমটির প্রতিষ্ঠাতা ‘শ্রী শ্রী দাদাজী মহারাজ’। তিনি এই আশ্রমটির প্রতিষ্ঠা এমন স্থানে করেছেন যেখানে শুধু গভীর জঙ্গল এবং বহু সাধকের সাধনস্থল ছিল। বহু অলৌকিক ঘটনার মধ্যে দিয়ে দাদাজী মহারাজ এই আশ্রমটি প্রতিষ্ঠা করেন। এই আশ্রমটির প্রতিষ্ঠার পিছনে সাক্ষাৎ মহাদেবের আশীর্বাদ রয়েছে। এই আশ্রমটি প্রতিষ্ঠা হওয়ার পর থেকেই বহু অলৌকিক ঘটনা একটার পর একটা আজও ঘটে চলেছে। বহু অলৌকিক দৃশ্যের ঘটনার বহু সাক্ষী অনেকে হয়ে রয়েছেন যাঁর কিছু প্রত্যক্ষ্য ঘটনা ছবির মাধ্যমে এই সাইটে প্রকাশ করা হয়েছে। অপূর্ব প্রাকৃতিক পরিবেশের মধ্যে তৈরি এই আশ্রমে দাদাজী মহারাজের তৈরি ‘সাধনপীঠ’-এ তাঁর শিষ্যদের দ্বারা যোগ সাধনার অভ্যাস হয়ে থাকে। ঈশ্বর দর্শনের জন্য দাদাজী মহারাজের নির্দিষ্ট সাধন পথে তাঁর শিষ্যরা এখানে সাধনরত অবস্থায় থাকেন। সাধনরত অবস্থায় দিব্য মহাপুরুষদের কৃপাও তাঁদের মধ্যে কেউ কেউ লাভ করেছেন। গ্রামের শান্ত প্রাকৃতিক পরিবেশের মধ্যে উত্তেরের প্রবাহমানা সিদ্ধ বক্রেশ্বর নদী ও দিব্য শ্বেত গঙ্গা নদীর সংগমস্থলে এবং আশ্রম থেকে সামান্য দূরে মহাসিদ্ধ ‘বক্রেশ্বর মহাশ্বমশান’-এর সংযোগ স্থলে অবস্থিত এই আশ্রম যা অপূর্ব সব বৃক্ষরাজীর দ্বারা সমাধৃত, সত্যিই যেন সাধকের ভগবৎ দর্শনের জন্য এমন অপূর্ব স্থান খুবই দুর্লভ।

 

दिव्याश्रम बक्रेस्वर महाशक्ति पीठ में स्थित हैं. यह महासिद्ध पीठ छोटे से बक्रेस्वर गाँव, बीरभूम जिला पश्चिम बंगाल में स्थित हैं. गाँव काफी छोटा होते हुये भी अपनी चैतन्यमय शक्तियों के कारण काफी विख्यात हैं. तक़रीबन २०,००० साल से भी पुरानी होने के कारन सतयुग काल से ही इस जगह कि वख्या शास्त्रों और पुरानो में विद्दमान हैं. इस जगह कि तरह और कोई दूसरी धार्मिक जगह प्राचीन भारत मैं नहीं पाई गई हैं. इस जगह का नामकरण महामुनि अस्टबक्र ऋषि के नाम पर बक्रेस्वर नाम पड़ा. महामुनि अस्टबक्र ने इसी जगह ब्रम्हकुंड में कठिन तपस्या करके भगवन शिव से वरदान प्राप्त किया और अपनी एक लाईलाज बीमारी से मुक्ति भी पाई. महादेव शिव, नारायण, नारद, दत्तात्रेय ऋषि, सप्तऋषि, संदीपन मुनि (भगवन श्री कृष्ण के गुरु), दुर्वाषा ऋषि, नित्यानंदा महाप्रभु, साधक बामदेव, रामानाथ अघोरी एवं अन्य कई महायोगीयो ने यहाँ घोर तपस्यारत हो कर कठोर साधना के द्वारा ब्रम्हज्ञान प्राप्त किया. वर्तमान में भी बहुत साधक यहाँ साधना करने के लिए इस अद्भुत महासिद्ध स्थान पर आते हैं. दिव्याश्रम भी इसी पावन भूमि महासिद्ध स्थान पर स्थित हैं. इस आश्रम का निर्माण श्री श्री दादाजी महाराज द्वारा हुआ हैं. जिस जगह पर आश्रम का निर्माण हुआ हैं वहा आश्रम से पहले एक घना जंगल हुआ करता था जहा महायोगीयो के आसन धारण कर काफी तपस्या कि थी. आश्रम के निर्माण से कई अद्भुत और अलौकिक घटनाऐ जुडी हैं. शाक्क्षात भगवन शिव के आशीर्वाद से श्री श्री दादाजी महाराज ने इस आश्रम का निर्माण किया हैं. आश्रम के प्रतिष्टा से लेकर आज तक एक के बाद एक ऐसे कई अलौकिक घटनाए हैं जो कि काफी अद्भुत हैं. कई लोग इन अद्भुत घटनाओ के शक्क्षी हैं. उनमे से कुछ घटनाओ कि तस्वीरे इस वेबसाइट पर डाली गई हैं. प्राकृतिक सौंदर्य के बिच स्थित दादाजी महाराज के इस साधना पीठ में उनके कई शिश्य साधनारत हो चुके हैं. दादाजी महाराज के आदेशानुसार बताये हुये मार्ग से उनके शिश्य यहा साधना करते हैं. उनमे से कई शिश्य ने साधना कर महायोगीयो और महापुरुषो से कृपा एवं आशीर्वाद प्राप्त किया. बक्रेस्वर गाँव के शांत वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य के बिच स्थित इस आश्रम के एक ओर (उत्तर दिशा में) दिव्य नदी स्वेत गंगा और महासिद्ध बक्रेस्वर नदी का संगम स्थल हैं एवं दूसरी ओर थोड़ी दूर पर बक्रेस्वर का महासिद्ध समशान स्थित हैं. इसके अलावा आश्रम के इर्दगिर्द कई फलो और फुओ के वृक्ष लगे हैं जो कि आश्रम कि शोभा बढ़ाते हुये साधक को खुले हाथो से साधना का निमंत्रण देते हैं साथ ही साथ ईश्वर दर्शन के लिए प्रेरित भी करते हैं. साधना के लिए ऐसा अपूर्व स्थान मिलना काफी दुर्लभ हैं.

 

ABOUT DIVYASHRAM

 

A number of supernatural events have taken place in the ‘Dibbyashram’ founded by Dadaji Maharaj at different times. Many yogi mahatma in their ‘sukshma’ body and a number of Gods and Goddesses have been unfolded.

বক্রেশ্বর ধামের দাদাজী মহারাজ প্রতিষ্ঠিত ‘দিব্যাশ্রমে’ বহু অলৌকিক ঘটনার প্রকাশ ঘটেছে বিভিন্ন সময়। সুক্ষদেহী বহু যোগী মহাত্মার এবং দিব্য শরীরে অনেক দেবদেবী বিভিন্ন সময় প্রকাশিত হয়েছেন।

दादाजी महाराज के हाथो द्वारा प्रतिष्ठित इस बक्रेस्वेर धाम में इस दिव्याश्रम में कई आलोकिक घटनाये घटी हैं | अनेक बार यहाँ पर महायोगीयो की मौजूदगी को उनके सूक्ष्म शारीर के दर्शन द्वारा पाया गया हैं एवं दिव्य शारीर में अलग अलग देव देवियों को कई बार यहाँ देखा गया हैं |

 


 

1

A miraculous incident occurred at the time when Bakreswar Dibbyashram of Dadaji Maharaj was founded. The ashram was yet to be finished. Two wells have been dug to replenish the paucity of water at that time to quench the thirst of the ashramites. One morning after entering the Ashrama with the labourers workong at the construction Dadaji saw that on the cemented wall of the wells someone with ‘chalk-pencil’ had written ‘Babaji Maharaj’. Everyone among the labourers were illiterate and it was imposible for them to know the name of ‘Mahavatar Babaji Maharaj’. Even then each of them were asked whether anybody among them had written the name of ‘Babaji Maharaj’. Each of them replied with negation and said that not only did they not know to read and write but also didnt have any use of ‘chalk-pencil’ and have never heard the name of ‘Babaji Maharaj’. This miraculous incident have been with the foundation of Dibbyashram since then.

বক্রেশ্বর দাদাজী মহারাজের ‘দিব্যাশ্রম’ প্রতিষ্ঠার সময় এক অলৌকিক ঘটনা ঘটে। আশ্রম তখনও অসম্পূর্ণ। শুধু জলের অভাব মেটাতে দুটো নতুন কুয়োঁ খনন করা হয়েছে। একদিন সকালে দাদাজী মহারাজ শ্রমিকদের সাথে আশ্রমে প্রবেশ করে দেখেন কুঁয়োর গায়ে যে সিমেন্টের বাঁধানো জায়গা তাতে কেউ চকপেন্সিল দিয়ে ‘বাবাজী মহারাজ’ নামটি লিখে রেখেছে।শ্রমিকদের মধ্যে সবাই অশিক্ষিত এবং মহাবতার বাবাজী মহারাজের নাম তাদের শোনার কথাও নয়। তবু এই নামটি কে লিখেছে এই বিষয়ে তাদের জিজ্ঞাসা করা হলে তারা যে লিখতে পারে না তা স্বীকার করলো, এবং চকপেন্সিলের তাদের যে প্রয়োজন পড়ে না সে কথাও জানালো, এবং বাবাজী মহারাজের নাম যে তারা জানে না সে কথাও জানালো। আজও এই ঘটনাটি একটি অত্যাশ্চর্য্য ঘটনা রূপে ‘দিব্যাশ্রম’ প্রতিষ্ঠার সময় থেকে এর সাথে জুড়ে আছে।

दादाजी महाराज के बक्रेस्वेर इस्थित इस दिव्याश्रम की प्रतिष्ठा के समय एक चमत्कारी घटना घटी | दिव्याश्रम का काम अभी तक चल ही रहा था | आश्रम में जल की कमी को पूरा करने हेतु दो कुओ की खुदाई की गयी एवं उनकी मजबूती के कारण कुओ की भीतरी दीवारे सीमेंट की बनायीं गयी | इसी काम के दौरान एक सुबह जब दादाजी महाराज ने श्रमिको के साथ आश्रम में प्रवेश किया तो देखा की कुए की एक दीवार पर “ बाबाजी महाराज “ लिखा हुआ था | बार बार पूछने पर मजदूरो ने यह ही कहा की उन लोगो में से कोई भी इंसान पढना लिखना नहीं जनता, सारे के सारे अनपढ़ हैं | और ना ही उन मजदूरो ने कभी महावातर बाबाजी महाराज का नाम अपनी जिन्दगी में सुना हैं | यह आश्चर्यचकित घटना दिव्याश्रम की प्रतिष्ठा के समय से लेकर आजतक आश्रम के साथ जुडी हुई है |

 


 

2

This picture taken in the year 2012 in the month of July is one of the rarest pictures of the world. Captured during the evening in the ashram on the roof top of Dadaji Maharaj’s room, the picture shows ethereal illuminated bodies of yogis and yoginis in yogic postures. these yogis have sometimes blessed the ashramites by their presence during their sadhana in the solitary hours. In the two pictures one is of a yogi meditating in padmasana and the other two yogis entangled in a specific posture of sadhana. These two pictures have been captured in unimaginable and unbelievable situation in Dibbyashram. These pictures are invaluable treasures of the spiritual world which force us to believe hat there is a ethereal supernatural world outside our practical world. We think that nowhere in the world such extraordinary pictures manifesting the divine supernatural powers of the yogis is to be found.

এই ছবিটি ২০১২ সালের জুলাই মাসের ক্যামেরায় ওঠা একটি ছবি যা পৃথিবীর মধ্যে বিরলতম ছবিদের মধ্যে একটি। প্রায় সন্ধ্যার সময়ে আশ্রমের ছবি তোলার সময় দাদাজী মহারাজের ঘরের ছাদের উপর শূন্যে সুক্ষ জ্যোতির্ময় দেহধারী এই তিনজন যোগী ও যোগিনীদের ছবি ধরা পড়ে। যাঁরা ফাঁকা জায়গায় সাধনরত অবস্থায় আশ্রমের বসবাসকারিদের দর্শন দিয়ে ধন্য করেছেন। এদের মধ্যে একজনকে পদ্মাসন অবস্থায় ধ্যানরত এবং বাকি দুজনকে এক বিশেষ সাধন মুদ্রা অবস্থায় সাধনরত দেখা যাচ্ছে। অকল্পনিয় এবং অবিশ্বাস্য অবস্থার এই ছবি গুলি ক্যামেরাবন্দী হয়েছে এই দিব্যাশ্রমে। আধ্যাত্মিক এই জগতের এ-এক মহা মূল্যবান ছবি যা আমাদের বিশ্বাস করাতে বাধ্য করেছে এই জগতের বাইরে এক সুক্ষ জগতের অস্তিত্ত্বকে স্বীকার করতে। মহাপুরুষদের দিব্য অলৌকিক ক্ষমতাকে জানতে। পৃথিবীর আর কোন দেশে এই রকম সুক্ষ আলোকময় মহাপুরুষদের ছবি এই অবস্থায় আর তোলা আছে বলে আমাদের জানা নেই।

वर्ष २०१२ के जुलाई माह में केमरे द्वारा ली गई यह तस्वीरे साधना जगत की नायाब एवं विश्व की दुर्लभ तस्वीरों में से एक है | आश्रम में दादाजी महाराज के कमरे की छत के ऊपर, संध्या के दौरान तस्वीरे लेते समय अकस्मात इन तस्वीरों को केमरे में कैद किया गया | यह तस्वीरे शुन्य सूक्ष्म ज्योतिर्मय देहधारी योगिनी और योगियों की योगिक मुद्रा की है | इन्ही योगियों ने कभी कभी साधनारत आश्रमवासियों को एकान्त में उनकी साधना के दौरान उनको दर्शन देकर आशीर्वाद दिया है | इन दो तस्वीरों में से एक पद्मासन की अवस्था में साधनारत योगी की हैं और दूसरी दो योगियों की साधना की एक विशेष मुद्रा की है | ये दो तस्वीरें दिव्याश्रम में अकल्पनीय और अविश्वसनीय स्थिति में कैद की गयी है | जो आध्यात्मिक दुनिया के अमूल्य खजाने में एक हैं| यह तस्वीरे हमे यथार्थ जगत से परे एक ईश्वरिय अलौकिक दुनिया है, इस बात पर विश्वास करने के लिए मजबूर करती हैं | हमे विश्व में कही भी एसी असाधारण तस्वीरे नहीं मिल सकती जिनमे योगियों की दिव्य अलौकिक शक्तियों का प्रकाश प्रकट हुआ हो |

 


 

3

This picture is of a seven hooded snake. The hoods are of a peculiar light red color. Below the hoods images of illuminated divine light can be seen. In the center is a peculiar divine white light in the form of a shivlinga. The hoods when viewed keenly shows light images of Gods and Goddesses embedded in it. From the stories of Hindu Puranas and shastras we come to know that when Lord Narayana rests in the ‘Khir Sagar’ (Sea of Milk) in the Ananta Sajjya’ the seven hooded snake (Ananta Naag) positioning himself like an umbrella protects Narayana from disturbance which might break his lord’s solitude. It is also explained in the shastras that seven hooded snake is the symbol of seven chakras which remains awakened in the body of a yogi. This divinely illuminated picture of seven hooded snake was captured by the camera quite incidentally just on top of the roof of Dadaji Maharaj’s room in Dibbyashram. This is one of the rarest supernatural incidents which leads us to believe the truth behind the shastras, puranas and the divine powers of the great yogis. These pictures help us to believe the supernatural power of the divine world and divine personalities.

এই ছবিটি একটি সাত মুখি ফনা ধরা সাপের। ফনা গুলি অদ্ভূত হালকা লাল রঙের, ফনার নীচে বিভিন্ন জ্যোতির প্রকাশিত রূপ, মাঝখানে শ্বেত শিবলিঙ্গ আকারের অদ্ভূত এক জ্যোতি। ভাল করে লক্ষ্য করলে দেখা যাবে প্রতিটি ফনাতে বিভিন্ন দেব দেবী ও মহাত্মাদের অস্ফুট ছবি প্রকাশিত। আমাদের ভারতীয় শাস্ত্রে বর্ণিত পুরান কাহিনী থেকে জানা যায় ক্ষীর সমুদ্রে নারায়ণ যখন যোগ নিদ্রায় অভিভূত থাকেন তখন তিনি অনন্ত নাগের উপর বিশ্রাম করেন এবং অনন্ত নাগ যার সাতটি ফনা আছে তিনি নারায়ণের মাথার উপর সেইগুলি মেলে ধরেন যাতে তাঁর কোন বিশ্রামে ব্যাঘাত না ঘটে। শাস্ত্রে আরও বর্ণিত আছে সাতমুখি ফনা ধরা সাপ হলো যে সব মহাযোগীদের শরীরের মধ্যে সাতটি যগ চক্র খুলেছে এই সাত মুখি সাপের ফনা হলো তারই প্রতীক। এই জ্যোতির্ময় সাতমুখি সাপের ফণাটি বক্রেশ্বর ধামে প্রতিষ্ঠিত দাদাজী মহারাজে দিব্যাশ্রমে ঘরের ছাদের মাথায় হঠাৎই প্রকাশিত হয়, এবং ক্যামেরায় এই ছবি তুলে রাখা হয়। দিব্যাশ্রমের ঘটনার মধ্যে এটি একটি অন্যতম ঘটনা, যা আমাদের শাস্ত্র পুরানের এবং আধ্যাত্মিক জগতের সত্যতাকে স্বীকার করতে বাধ্য করায়। মানুষকে ঈশ্বরীয় শক্তির অস্তিত্ত্বের কথাকে বিশ্বাস করাতে এই অবিশ্বাস্য ছবি গুলি সাহায্যের হাত বাড়িয়ে দেয়।

यह तस्वीर एक सात फनो वाले साँप की है | फन अद्भुत हलके लाल रंग के हैं फनो की निचे विभिन्न दिव्य ज्योति का प्रकाश देखा जा सकता हैं | फनो के बिच में स्वेत शिवलिंग के आकर में एक अद्भुत दिव्य श्वेत ज्योति दिख रही हैं | फनो को ध्यान से देखने पर अनेक देवी – देवताओं के चित्र उभर कर सामने आते हैं | हिंदू पुराणों और शास्त्रों की कहानियों के अनुसार जब भगवान नारायण क्षीर-सागर में योग निंद्रा में ध्यानस्थ सात फनो वाले साप कि अनंत संया (अनंत नाग) पर विश्राम करते हैं तब वह नाग स्वय के फनो को फैला कर एक छतरी की तरह भगवन नारायण कि अशांति से रक्षा करता है, ताकि उसके प्रभु का एकांत भंग न हो जाये | शास्त्रों में यह भी बताया गया हैं सात फनो वाला नाग सात चक्रों को संबोधित करता है, जो कि योगी के सरीर में जागृत अवस्था में रहता हैं | सात फनो वाले नाग कि ये आलौकिक ज्योति वाली यह तस्वीर दिव्यश्रम मैं दादाजी महाराज के कमरे कि छत के बिलकुल ऊपर आकस्मत ही केमरे में कैद कि गई | यह एक ऐसी दुर्लभ देविक घटना हैं, जो हमे शास्त्रों और पुराणों एवं महायोगियों कि शक्ति के पीछे के सत्य पर विस्वास करने के लिए बाध्य करती हैं | यह तस्वीरे परमात्मा के आलौकिक जगत एवं महान महापुरुषो कि अलौकिक शक्ति पर विश्वास करने के लिए मदद करती हैं |

 


 

4

These pictures are of different divine lights. These have been expressed at different times at the Dibbyashram and have been captured by camera. Those who are engaged in Sadhana know that in the various stages of sadhana, according to the chakras touched during sadhana, different colors of divine light are unfolded in the ‘Aggya Chakra’. These are the signs of high stages of sadhana. These seven chakras are present inside the body similarly these seven stages are present outside the body in the universe. In any place be it in Mandir or home or in a Ashram wherever there is an expression of divine power these divine ‘Bramha Jyotis’ manifests themselves as a symbol of divinity. Many a time yogis of high stature let their presence be felt and bless sadhakas in their onward journey of Sadhana, some people during their stay in the ashram became witness to some supernatural divine sights.

এই ছবিগুলি বিভিন্ন জ্যোতির। এগুলি ‘দিব্যাশ্রম’ এর বিভিন্ন সময় প্রকাশিত হয়েছে যা ক্যামেরার লেন্সে ধরা পড়েছে। যাঁরা সাধন করেন তাঁরা জানেন সাধনের বিভিন্ন স্তরে জ্যোতির বিভিন্ন রূপ ও রং আজ্ঞাচক্রে প্রকাশিত হয়। এগুলি সাধনের উচ্চতর অবস্থার প্রকাশ। এই জ্যোতিগুলি যেমন শরীরের সাতটা চক্রের মধ্যে বিদ্যমান তেমনি শরীরের বাইরেও এই ভূমণ্ডলে বিদ্যমান। যেখানে সাধনের শক্তি প্রকাশিত হয়, তা কোন মন্দিরই হোক, গৃহই হোক বা আশ্রমই হোক সেখানে স্বঃতস্ফুর্ত ভাবে ভগবৎ শক্তির প্রকাশ রূপে এই ব্রহ্মজ্যোতিঃ প্রকাশিত হয়। কখনও কখনও এই জ্যোতির রূপ ধরে অনেক উচ্চ পর্যায়ের যোগীরা বিভিন্ন সাধকদের দর্শন ও দিয়ে থাকেন। এই ব্রহ্মজ্যোতির প্রকাশ সাধকদের এগিয়ে নিয়ে যেতেও সাহাজ্য করে।

यह चित्र विभिन्न आलौकिक दिव्य ज्योतियों के हैं | यह दिव्याश्रम में अलग-अलग अवसरों पर प्रकाशित हुई हैं और कैमरे द्वारा कैद कि गई हैं | जो लोग साधना से जुड़े हुये हैं, वे लोग जानते हैं कि साधना के अलग अलग चरणों में साधना के दौरान, जागृत हुये चक्रों के अनुसार ‘आज्ञा चक्र’ में विभिन्न वर्णों (रंगों) कि ज्योयिया प्रकाशित होती हैं | यह ऊच स्तर कि साधना कि सूचक हैं | जिस प्रकार ये सात चक्र शारीर के भीतर विधमान हैं उसी प्रकार यह सात चरण सरीर के बहार ब्रम्हांड में भी विद्दमान हैं | कोई भी जगह, चाहे वो घर हो या मंदिर या आश्रम, जहाँ भी दिव्या एवं आलौकिक शक्तियों का प्रकाश या भाव हैं वहां ये ब्रम्ह ज्योतिया स्वय को आलौकिकता के प्रतिक के रूप में प्रकाशित करती हैं | बहुत बार बड़े-बड़े योगी दर्शन देते हैं और साधको को उनकी आगे कि साधन यात्रा के लिए आशीर्वाद देते हैं | आश्रम में अपने निवास के दौरान , कुछ लोग इन अलौकिक दिव्य दृश्यों के साक्षी भी बने हैं |

 


 

5

Awakened at the middle of the night by some loud sound some ashramites saw a beam of white light in the middle of the central hall and illuminated by the light and in the center of the white beam Goddess Kali moving from one side of the hall to another. They became speechless at this sight.

আশ্রমে থাকাকালিন কয়েকজন লোকের এক অলৌকিক দর্শন হয়। তাঁরা মধ্য রাত্রে কোন আওয়াজ শুনে চোখ খুলে দেখেন তীব্র শ্বেত জ্যোতির মধ্যে মা কালী প্রকাশিত হয়ে আশ্রমের বড় হল ঘরটিতে বিচরণ করছেন। এই অলৌকিক দর্শনে তাঁরা বাক্-রুদ্ধ হয়ে পড়েন এবং সারা বক্রেশ্বরে এই অলৌকিক ঘটনার কথা প্রচারিত হয়ে যায়।

आश्रम में रहते समय कई आश्रमवासियों को एक अद्भत दर्शन हुए | उनमेसे कई लोगो ने मध्य रात्रि में सोते समय अचानक एक अजीब सी आवाज सुनी, आखे खोल के देखा तो एक तीव्र श्वेत ज्योति से परिपूर्ण माँ काली बड़े हॉल में विचरण करते हुए एक ओर से दूसरी ओर आ-जा रही थी | जिन जिन ने इस अद्भुत दृश्यों को देखा वह अवाक रह गए | सरे बक्रेश्वेर धाम में यह चमत्कारी घटना विख्यात हो गयी |

 


 

6

After the land for building the ashrama was bought and construction of the ashrama started ‘Lord Shiva’ was seen throwing his Trishul to one particular place of the land and Dadaji Maharaj heard Lord Shiva saying these words: “Nobody has the power to stop you from making the Ashram”, and surprisingly later the rooms of the ashrama building were made in the same place as shown by Lord Shiva.

আশ্রমের জমি কিনে আশ্রমের ঘর তৈরির সময় দেবাদিদেব মহাদেব তাঁর ত্রিশুল মাটিতে এক নির্দিষ্ট জায়গায় নিক্ষেপ করে দাদাজী মহারাজ কে বলেছিলেন “তোঁকে আশ্রম তৈরি করতে আটকাবার ক্ষমতা কারুর নেই।” পরবর্তী কালে আশ্রমের ঘর সেখানেই তৈরি হয়।

दादाजी महाराज के आश्रम के निर्माण के लिए जमीन खरीदी गई और आश्रम का निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया, उसी समय देवाधिदेव महादेव भगवान शिव ने आश्रम भूमि की एक खास जगह पर अपने त्रिशूल को फेकते हुए भूमि में गाड दिया और भगवान शिव ने दादाजी महाराज इन्ही शब्दों में कहा “तुम्हे इस आश्रम को बनाने से कोई भी शक्ति अटका नहीं सकती “ | हैरत की बात यह हैं की बाद में आश्रम भवन के कमरे उसी जगह पर ही बने जिस जगह भगवन शिव ने अपना त्रिशूल गाडा था |

 


 

7

Bhagavat Purush Sri Sri Babathakur had said to Dadaji Maharaj during Dadaji Maharaj’s first visit to Bakreswar, “When I first visited Bakreswar I met Asthabakra Rishi, now you are also going to visit Bakreswar, if you meet Asthabakra Rishi then do not be afraid” and surprisingly when Dadaji Maharaj went to Bakreswar he met Maharishi Asthabakra inside the Bakreswar temple and found him exactly the same as described by Babathakur. This extremely powerful and ‘Mahagyani’ Maharishi is about 20,000 years of age. He is ‘Rishi’ of Satya Yug. Still now some fortunate yogi receives his blessings and sees his manifestation at bakreswar Dham.

দাদাজী মহারাজের প্রথম বক্রেশ্বরধাম ভ্রমণের সময় ভগবৎ পুরুষ শ্রী শ্রী বাবাঠাকুর তাঁকে বলেছিলেন “আমি যখন প্রথম বক্রেশ্বর যাই সেদিন আমার সাথে অষ্টাবক্র ঋষির সাক্ষাৎ হয়েছিল। তুইও তো যাচ্ছিস, তোর সাথে যদি দেখা হয় তখন ভয় পাসনা যেন।” অত্যাশ্চর্য্য ঘটনা এই যে বাবাঠাকুর যেমনটি অষ্টাবক্র ঋষির বর্ণনা দিয়েছিলেন, ঠিক সেই ভাবেই সেই রূপেই দাদাজী মহারাজের সাথে এই মহা ঋষির সাক্ষাৎ হয়েছিল বক্রেশ্বর মন্দিরের ভীতর। এই মহাতেজা মহাজ্ঞানী মহাঋষির বয়স প্রায় ২০,০০০ বছর। ইনি সত্য যুগের ঋষি। এখনও কোন কোন মহাযোগীকে কৃপা করে দর্শন দিয়ে ধন্য করেন এই বক্রেশ্বরধামে।

दादाजी महाराज की पहली बक्रेस्वर यात्रा के दौरान भगवत पुरुष श्री श्री बाबा ठाकुर ने दादाजी महाराज से कहा था, “मैं पहले बक्रेस्वेर भ्रमण कर चूका हु, उसी समय मेरी मुलाकात अस्टबक्र ऋषि से भी हुई थी, तुम भी वहा जा रहे हो, तुम्हारी भी मुलाकात होगी अस्टबक्र ऋषि से, भय मत करना ” | आश्चर्य की बात है जब बक्रेस्वेर मंदिर के भीतर दर्शन के लिए दाजी महाराज गये तो उन्होंने वहा महर्षि अस्टबक्र से मुलाकात की और श्री श्री बाबा ठाकुर द्वारा वर्णित उनका जो रूप सुना था उन्हें बिल्कुल वैसा ही पाया | वे अत्यंत तेजस्वी, शक्तिशाली और महाज्ञानी महर्षि हैं जिनकी आयु तक़रीबन २०,००० वर्ष की हैं | बाबा ठाकुर ने कहा था कि ये सत्ययुग के ऋषि है | परन्तु आज भी ऐसे कुछ भाग्यशाली योगी उनका आशीर्वाद प्राप्त करतें है और बक्रेस्वेर धाम पर उनकी अभिव्यक्ति आज भी दिखती हैं |

 


 

8

There are however three more ancient Bakreswar similar to Bakreswar Dham. Among them one is the Dihi Bakreswar. This excellent Sadhanpith is set among beautiful natural settings. There is a great ancient Banyan tree inside the temple complex at Bakreswar. There is a siddha-asana of Durbasha Rishi inside the hole of the great Banyan tree. The villagers say that no Sadhak has still now shown courage to sit on this Siddhasana of Rishi Durbasha. Dadaji Maharaj showed his desire to sit on this siddhasana and the villagers were surprised and told Dadaji that no one has ever tried to sit on this asana but probably Dadaji could sit on it. Dadaji wasted no time and entering the dark hole of the banyan tree sat on the siddhasana and quickly attained Samadhi. Coming out of the Samadhi Dadaji found his body covered with flowers and mermelos leaves and a few people crying infront of him and bowing their heads to touch his feet. The villagers were astonished to see Dadaji and continued to think how this was possible.

বর্তমান বক্রেশ্বর ধামের মতো আরও তিনটি প্রাচীন বক্রেশ্বর ধাম বীরভূমে বর্তমান আছে। তাঁর মধ্যে একটি ডিহি বক্রেশ্বর ধাম। অপূর্ব এক প্রাকৃতিক পরিবেশের মধ্যে রচিত হয়েছে এই মহাসাধন পীঠটি। এখানে অতি প্রাচীন মহাকায় একটি বটবৃক্ষ আছে। এই বট গাছের কোটরে মহাঋষি দুর্ব্বাসার একটি সিদ্ধাসন আছে, যা বিগত ৫,০০০ বছর ধরে শূন্য পড়ে আছে এবং কোন সাধক এই আসনে বসে সাধন করার সাহস আজ পর্যন্ত দেখাননি, গ্রামের লোকের এই বক্তব্য। সেদিন মহারাজ গ্রামের লোকদের অনুরোধ করেছিলেন তিনি এই আসনে সাধন করার জন্য। তাঁরা আশ্চর্য্য হয়ে বলেছিলেন, “আজ পর্যন্ত কেউ পারেননি, দেখুন হয়তো আপনি পারবেন।” মহারাজ তৎক্ষনাৎ সেই অন্ধকারময় বট গাছের কোটরে ঢুকে সাধনে বসেন এবং সমাধিস্থ হয়ে যান। সমাধি থেকে ফিরে তিনি দেখতে পান তাঁর সারা শরীরে ফুল ও বেলপাতা ছড়ানো এবং সামনে দাঁড়িয়ে কয়েকজন ক্রন্দনরত অবস্থায় তাঁকে প্রণাম করছেন। এই ঘটনায় সেখানে উপস্থিত গ্রামের লোকেরা অবাক হয়ে গিয়েছিল, এবং সশ্রদ্ধ চোখে তারা মহারাজকে দেখছিলেন এবং ভাবছিলেন যে কি করে এই কাজ ইনি সম্ভব করলেন।

बक्रेस्वेर धाम के समान तीन और पौराणिक बक्रेश्वेर भी हैं | उनमें से एक हैं – “दिही बक्रेश्वेर” | अत्यंत सुन्दर प्राकृतिक वातावरण में स्तिथित यह एक अति उत्तम साधनापीठ हैं | बक्रेस्वेर के मंदिर परिसर के अंदर एक महान प्राचीन बरगद का पेड़ है | इस बरगद के पेड़ के अंदर एक घुफा हैं जहा पर दुर्बाषा ऋषि का एक सिध्द-आसन है | ग्रामवासियों का कहना हैं कि कोई भी साधक अब तक ऋषि दुर्बाषा के इस सिध्द-आसन पर बैठने का साहस नहीं दिखा पाया है | परन्तु, जब दादाजी महाराज ने इस सिध्द-आसन पर बैठने की इच्छा प्रकट कि तो ग्रामवासी आश्चर्यचकित हो गए और दादाजी महाराज को बोले कि कभी भी किसी ने इस आसन पर बैठने कि कोशिश नहीं कि, लेकिन दादाजी महाराज संभवत बैठ सकते हैं | तुरंत इस बात के उपरांत दादाजी ने समय को नस्ट न करते हुये बरगद के पेड़ के अंधेरे छेद में प्रवेश किया और सिध्द-आसन पर बैठ गए और तुरंत ही सम्धिस्त हो गए | दादाजी जब समाधि से बाहर आये तब उनका शारीर फूलो और बेल-पत्रों से सजा हुआ था और उनके सामने कुछ लोग अत्यंत भावुक अवस्था में आखो में आसू लिए शीष झुका कर उनके चरणों में प्रणाम कर रहे थें | ग्रामवासी दादाजी को देख कर अचंभित थे और सोचने लगे कि यह किस प्रकार संभव हैं |

 


 

9

From ancient times the district of Birbhum has been the favourite place of Sadhana among the Mahayogis. Still now in many places of Birhum the sadhanpith of yogis of high stature and mahayogis of anciet time are present. Among these Ashtabakra Rishi, Durbasha Rishi, Medhash Rishi, Sandipan Muni, Bivandak Rishi, MAharshi Bharadwaj, Rishi Brihadarannyk, Rishasringa Muni,Garga Muni, Mandavya Muni and rishi and maharshi like Dattatreya Rishi can be found. Rishi Bharadwaj and Bivandak Rishi were authors of Upanishad. Dadaji Maharaj did sadhana on the siddhasana of Rishi Brihadarannyka.

 
 

বীরভূম জেলা অতি প্রাচীন কাল থেকে মহাযোগীদের সাধন স্থল হিসেবে অত্যন্ত প্রিয় জায়গা। বীরভূমের বিভিন্ন অঞ্চলে এখনও ছড়িয়ে আছে প্রাচীন কালের অতি উচ্চকোটি মহাপুরুষদের সাধনপীঠ যা আজও জাগ্রত ও আধ্যাত্মিক শক্তিতে পরিপূর্ণ। এই সব মহাঋষিদের মধ্যে আছেন অষ্টাবক্র ঋষি, দুর্বাসা ঋষি, মেধস ঋষি, সন্দিপন মুনি, বিভান্ডক ঋষি, মহাঋষি ভরদ্বাজ, ঋষি বৃহদারণ্যক, ঋষ্যশৃঙ্গ মুনি, গর্গ মুনি, মান্ডব্য মুনি, মহাযোগী দত্তাত্রেয়-র মতো মহাযোগী, ঋষি ও মুনিরা। এনাদের মধ্যে মহাঋষি ভরদ্বাজ ও বৃহদারণ্যক উপনিষদের প্রণেতা ঋষি বৃহদারণ্যকের সাধন স্থলে দাদাজী মহারাজ সাধন করেন।

प्राचीन काल से ही बीरभूम जिला महयोगियो के बीच साधना की पसंदीदा जगह रही है | आज भी बीरभूम के कई स्थानों में ऊचातम स्तर के योगियों और प्राचीन समय की महयोगियो की साधना पीठ मौजूद हैं | जैसे अस्टाबक्र ऋषि, दुर्वाशा ऋषि, मेधास ऋषि, संदीपन मुनि, भिवन्डक ऋषि, महर्षि भारद्वाज, ऋषि ब्रिहदारनक, रिशासृन्गा मुनि, गर्ग मुनि, माडव्य मुनि और दत्तात्रेय ऋषि | ऋषि भारद्वाज और भिवन्डक ऋषि उपनिषद के लेखक थे | दादाजी महाराज ने ऋषि ब्रिहदारनक की सिद्धासन पर साधना कि हैं |

 


 

10

In the ashrama of Sri Bijoykrishna Goswami at Bakreswar there was a black dog. Whenever Dadaji Maharaj visited the ashrama of Bijoykrishna Goswami and stayed there the black dog used to come from nowhere to the room of Dadaji Maharaj and stayed with him. Once during Dadaji Maharaj’s stay in the ashrama when the disciples of Dadaji was performing his arati, the dog also picked up a few incense sticks and began rotating it infront of Dadaji and started doing the arati. The disciples and all other people present there became astonished by this performance.

বক্রেশ্বরের বিজয়কৃষ্ণ গোস্বামীজীর আশ্রমে একটি বড় কালো কুকুর মহারাজ যখনই ঐ আশ্রমে থাকার জন্য আসতেন, সে কোথা থেকে এসে মহারাজের ঘরেই আশ্রয় নিত। একদিন সন্ধ্যায় দাদাজীর শিষ্যরা যখন তাঁর আরতি করছিল তখন সেও ধুপকাঠি দাঁতে চেপে ধরে মহারাজের আরতি করে সবাইকে অবাক করে দিয়েছিল।

बक्रेस्वेर में श्री विजय कृष्णा गोस्वामी जी के आश्रम में दादाजी महाराज जब भी जाते थें, वहा एक काला कुत्ता कही से आश्रम में आकर दादाजी महाराज का आश्रय लेता था | एक दिन संध्या के समय दादाजी महाराज के शिष्य उनकी पूजा व आरती कर रहे थे तब वो काला कुत्ता भी अगरबत्ती को दांतों के बिच दबा कर दादाजी महाराज का आरती करके उनके सभी शिष्यों को अवाक् कर दिया | वर्तमान शिष्यों और अन्य सभी लोगों को इस प्रदर्शन ने एकदम से चकित कर दिया |

 
 

 


 

11

This temple is a temple of Lord Shiva founded by Dadaji Maharaj at Bakreswar Dham in the year 2010. The Shiva Linga inside this temple is Hara-Gouri Linga described in the shastras. This Shiva Linga which is of a rare quality also fulfills the wishes of people. This Shiva Linga is famous as Prabaleshwar Mahadev at bakreswar.

এই মন্দিরটি একটি শিব মন্দির যা বক্রেশ্বর ধামে দাদাজী মহারাজ দারা নির্মিত ও প্রতিষ্ঠিত হয়েছে। ২০১০ সালে নির্মিত এই শিব মন্দিরের ভীতর যে শিব লিঙ্গটি আছে তা শাস্ত্রে বর্ণিত হরগৌরী মূর্ত্তি। অত্যন্ত দুর্লভ এই শিব লিঙ্গ মনোরথ পূর্ণ করেও বটে। এই শিবলিঙ্গটি বক্রেশ্বরে প্রবালেশ্বর মহাদেব বলে খ্যাত হয়েছে।

यह मंदिर एक शिव मंदिर हैं जो बक्रेस्वेर धाम में दादाजी महाराज द्वारा निर्माण व प्रतिष्ठित हुआ हैं | २०१० साल में निर्माण हुआ यहाँ शिव मंदिर के अन्दर जो शिवलिंग स्थापित हैं वह शास्त्रों के हिसाब से हर-गौरी मूर्ति हैं | अत्यंत दुर्लभ गुणवत्ता वाला ये शिव लिंग लोगों की मनोरथ पूर्ण करने वाला हैं | यह शिव लिंग बक्रेस्वेर में प्रबालेस्वेर महादेव के नाम से विख्यात है |

 
 

 


 

12

One of the most secret of shaktipith is Tantreswar which is located at Jharkhand. In one of the deepest jungles of Jharkhand and from underneath the soil Dadaji Maharaj discovered the most ancient shivlinga, about 10,000 years old. He named the shivlinga Dwapareswar Mahadev Mandir. It is said that at Dwapareswar yug, Pancha Pandav together with Kunti and Draupadi hid themselves in these jungles during ‘Aggyatabash’ (exile) and founded this shivlinga for them to worship. Later Sri Krishna, Pancha Pandav, Kunti, Draupadi all worshiped this shivlinga. Later for thousands and thousands of years no trace of this shivlinga could be found. Until recently the villagers witnessed strange supernatural incidents in the area of jungle from where this shivlinga was later discovered. The villagers also witnessed a number of yogis and mahayogis in ethereal form moving around. They told all these incidents to Dadaji Maharaj. After Dadaji heard about these incidents he began a search for this shivlinga and voiced his decision to develop a Shiv Temple inside the jungle. The villagers were afraid of untoward incidents. But Dadaji had made a ‘Sankalp’ to make this Shiv Mandir on that particular land of the jungle. The labourers warned him of great ‘Ajgar’ snakes of upto 15ft. residing there. Also there were wild animals and hordes of elephants. The labourers refused to work but Dadaji assured them and said that no wild animals would dare to touch them. He also said jokingly to the labourers, “I had given the snakes 24 hours notice to leave this land” and surprisingly the two and half month during which the work of the temple continued no snakes were seen in the area. Only the day the temple was finished 24 elephants came down the hills into the jungle and encircled the temple. The labourers in fear called Dadaji Maharaj in phone urgently and said they were afraid and what should they do now, they had decided to leave work and flee. Dadaji Maharaj pacified them and said that the elephants had come to see the Shiva Temple and they will go after paying their homage to Lord Shiva. As predicted by Dadaji Maharaj the elephants encircled the temple and raised their trunks facing the temple in salutation and quietly left the place.

অতিগুপ্ত শক্তিপীঠের অন্তর্গত হল তন্ত্রেশ্বর পীঠ, যা ঝাড়খন্ডে অবস্থিত। এখনকার এক গভীর জঙ্গলে মাটি খুড়ে দাদাজী মহারাজ আবিষ্কার করলেন ১০,০০০ বছরের পুরানো এক শিবলিঙ্গ, যার নাম মহারাজ রেখেছেন দ্বাপরেশ্বর মহাদেব। কথিতে আছে দ্বাপর যুগে পঞ্চপাণ্ডব সহ দ্রৌপদি ও কুন্তি এই জঙ্গলে অজ্ঞাতবাস করেছিলেন, তখন পঞ্চপাণ্ডব এই গভীর জঙ্গলে নিজেদের পূজার মানসে এই শিবলিঙ্গ প্রতিষ্ঠা করেন। পরে শ্রী কৃষ্ণ সহ দ্রৌপদি, কুন্তি ও পঞ্চপাণ্ডব এই শিবলিঙ্গ পূজা আর্চ্চনা করেন। পরবর্ত্তী হাজার হাজার বছর ধরে এই শিবলিঙ্গের আর কোন খোঁজ পাওয়া যায় না। পরবর্ত্তী সময়ে এখন এখানকার গ্রামবাসীরা এই জঙ্গলের ঐ নির্দিষ্ট জায়গায় বহু অলৌকিক জিনিষ দর্শন করেন। বহু সুক্ষ শরীরের মহাত্মার যাতায়াতের কথাও গ্রামবাসীরা দাদাজী কে জানান। দাদাজী ঐ জায়গায় শিবলিঙ্গের খোঁজ করে মন্দির প্রতিষ্ঠার কথা বললে গ্রামবাসীরা তাদের ভয়ের কথা জানান এবং মহারাজকে বারণ করেন মন্দির বানাতে। দাদাজী কারো কথা না শুনে ঐ মন্দির বানাবার সঙ্কল্প নেন এবং শিবলিঙ্গটি মাটি খুড়ে বার করেন। মিস্ত্রিরা তাঁকে বলেন এখানে পনেরো কুড়ি ফুটের অজগর সাপ এবং অন্যান্য হিংস্র জন্তুর সাথে অজস্র হাতিও আছে। তাদের ভয়ে মিস্ত্রিরা কাজ করতে নারাজ হয়। কিন্তু দাদাজী তাদের অভয়বাণী দিয়ে বলেন কোন হিংস্র জন্তু তাদের কোন ক্ষতি করবে না। মহারাজ মজা করে বলেন “আমি সাপেদের চব্বিশ ঘন্টা সময় দিয়েছি এখান থেকে সরে থাকতে, তারা মন্দির হওয়া পর্যন্ত এখানে আসবে না।” মিস্ত্রিরা অবাক হয়ে মহারাজের কথায় বিশ্বাস করে কাজে যোগ দেয়। সত্যি কিন্তু মন্দির তৈরি হওয়ার সময় থেকে আড়াই মাস সাপেদের ওখানে দেখা যায়নি। শুধু মন্দির শেষ হওয়ার দিন চব্বিশটা হাতি এসে মন্দিরটা ঘিরে দাঁড়িয়ে পড়তে দেখে মিস্ত্রি বাবুলাল দাদাজীকে ফন করে জানায় যে তারা এবার কি করবে। তাদের খুব ভয় করছে। তারা কাজ ছেড়ে চলে যাবে কিনা? মহারাজ তাদের আশ্বস্থ করে বলেন “হাতিরা শিব মন্দিরটি দেখতে এসেছে। দেখেই চলে যাবে।” ঘটনা ঘটলও তাই। হাতিরা শুড় তুলে শিবমন্দিরটিকে প্রণাম করার মতো করে চলে গেলো।

झारखंड के जंगलो में स्थित “तंत्रेस्वेर” अत्यंत रहस्यमयी शक्तिपिठो में से एक हैं | झारखंड के एक अत्यंत घने जंगल में और मिटटी के निचे दादाजी महाराज ने सबसे पौराणिक शिवलिंग कि खोज कि , जो कि तक़रीबन १०,००० साल पुराना हैं | उन्होंने शिवलिंग को द्वापरेस्वेर महादेव मंदिर नाम दिया | कहा जाता हैं कि द्वापरेस्वेर युग में, पंच पांडव जब माता कुंती और द्रौपदी के साथ ‘ आज्ञातवास ’(निर्वासन) के दौरान इन जंगलों में छुपे हुये थें तब उस समय उन लोगो ने पूजा करने हेतु इस शिवलिंग की स्थापना की थी | कहा जाता है कि बाद में श्री कृष्ण, पंच पांडव, कुंती, द्रौपदी सभी ने इस शिवलिंग की पूजा की | इसके बाद हजारों-हजारों वर्षों तक लोगों के लिए इस शिवलिंग का कोई निशान नहीं मिला | हाल कि बात हैं जब ग्रामीणों ने जंगल के उस क्षेत्र में अजीब अलौकिक घटनाओं को देखा, जहाँ बाद में जा कर यह पता चला कि ठीक उसी जगह शिवलिंग था | घ्रामिनो ने अनेक बार उसी स्थान पर कई साधुओ और महापुरुषों को घूमते हुये या कुछ धुन्धंते हुये देखा | तब ग्रामीणों ने दादाजी महाराज को इन सभी घटनाओं के बारे में बताया | इन घटनाओं के बारे में सुनने के बाद दादाजी महाराज ने इस शिवलिंग के लिए एक खोज शुरू की और जंगल के अंदर एक शिव मंदिर को विकसित करने के अपने फैसले पर आवाज उठाई | ग्रामीण उन अप्रिय घटनाओं से डर रहे थे जो उन्होंने अपनी आँखों से देखि थी | लेकिन दादाजी ने जंगल की विशेष भूमि पर इस शिव मंदिर बनाने के लिए एक ‘संकल्प’ बनाया लिया था | मजदूरों ने तो यह तक चेतावनी दी थी कि १५ फीट के बड़े-बड़े अज्गर सांप इस इस शिव लिंग को घेरे हुये हैं और इसके अलावा जंगली जानवरों और हाथियों की भीड़ लगी रहती हैं यहाँ पार | इसी चेतवानी के साथ-साथ मजदूरो ने काम करने से साफ़ इनकार कर दिया लेकिन दादाजी ने उन्हें आश्वासन दिया और आश्वासन देते हुये ये कहा कि कोई जंगली जानवर उन्हें छूने की हिम्मत भी नहीं करेगा | उन्होंने मजदूरों को मजाक में यह भी कहा कि “ मेने सपो को इस जमीन को छोड़ने के लिए २४ घंटे कि चेतवानी दे दी हैं” | बाद में मंदिर के निर्माण के दौरान देखा गया कि आश्चर्यजनक रूप से ढाई महीने तक जब तक मंदिर निर्माण कार्य चल रहा था कोई भी साप उस क्षेत्र के आस पास तक नहीं दिखा | केवल मंदिर निर्माण कार्य के समाप्ति वाले दिन एक 24 हाथियों का झुण्ड पहाडियों से निचे उतर आया और मंदिर को चारो ओर से घेर लिया | भयभीत मजदूरों ने इस इस्थिति के कारन काम छोड़कर पलायन करने का फैसला कर लिया और तुरंत उसी समय तत्काल दादाजी महाराज को फोन में सारा हाल कहा और डरते हुये पूछा कि वे उनको आब क्या करना चाहिए | दादाजी महाराज ने मजदूरो को शांत करते हुये कहा कि यह हाथियो का झुण्ड शिव मंदिर को देखने के लिए आया हैं और वे भगवान शिव को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद वापस चले जायेंगे | दादाजी महाराज कि भविष्यवाणी के फलस्वरूप हाथियों ने मंदिर घेर लिया और अभिवादन में मंदिर का सम्मान देते हुये आपनी सुन्डको उठाया और चुपचाप उस जगह छोड़ दिया |

13

Dadaji Maharaj fulfilled the desire of the villagers of Bakreswar Shiv Pith by creating the Nat Mandir and the very old Panchamundi Ashan, which was very much neglected by the people, has been also renovated by Dadaji Maharaj of Dibbyashram. Now both of these structures has become the integral part of Bakreswar Shiv Mandir and Pithasthan.
The Nat Mandir and Panchamundi Ashan were both innaugrated on Maha Shiv Ratri Utsav, dated 17th February, 2015.

বক্রেশ্বর শিব ধামের স্থানীয় গ্রাম বাসিদের বহুদিনের মনের বাসনা ছিল যে বক্রেশ্বর মন্দিরে একটি নাট মন্দির তৈরি হোক । বহু বছর বাদে তাদের সেই মন বাসনা পূর্ণ হয়েছে দিব্যাশ্রমের মহারাজ দাদাজী মহারাজের দ্বারা ।
দাদাজী মহারাজ তাঁর মন মতন নাট মন্দিরটি তৈরি করে ১৭ ফেব্রুয়ারী ২০১৫, মহা শিব রাত্রির দিন নাট মন্দিরটি বক্রেশ্বর শিব ও মা মহামায়ার নামে উৎসর্গ করেন । এর সাথে বক্রেস্বরের বহু প্রাচীন পঞ্চমুন্ডির আসনটির ও নুতন করে সংস্কার ও পরিমার্জন করে দেন । এই দুটি স্থান এখন বক্রেশ্বরের দ্রষ্টব্য বস্তুর মধ্যে দর্শনীয় ।